फिल्मों में एक छोटा सा नंबर भी कहानी का हीरो बन जाता है, लेकिन असल जिंदगी में वही नंबर नियमों के सामने बेबस हो जाता है। ‘786’ एक ऐसा अंक, जिसे लोगों ने आस्था, किस्मत और फिल्मों के जरिए एक खास पहचान दी। खासकर कुली में अमिताभ बच्चन के किरदार ने इसे एक सांस्कृतिक प्रतीक बना दिया। लेकिन जब यही भावनाएं अदालत के दरवाजे तक पहुंचती हैं, तो वहां सिर्फ कानून की भाषा चलती है, भावनाओं की नहीं। गुजरात हाईकोर्ट में पहुंचे एक कुली का मामला भी कुछ ऐसा ही था, जहां एक ‘बिल्ला’ सिर्फ नंबर नहीं, बल्कि पहचान और अधिकार की लड़ाई बन गया। पर अदालत ने साफ कर दिया कि रेलवे के नियम किसी भी भावना से ऊपर हैं।

मामला अहमदाबाद के कालूपुर रेलवे स्टेशन से जुड़ा है, जहां एक कुली ने अपने कथित रिश्तेदार का लाइसेंस बैज अपने नाम कराने की मांग की। उसने दावा किया कि वह मूल लाइसेंस धारक का करीबी रिश्तेदार है और उसकी तबीयत खराब होने के कारण यह बैज उसे मिलना चाहिए। लेकिन रेलवे प्रशासन ने इस मांग को खारिज कर दिया। कई बार अदालत का दरवाजा खटखटाने के बाद भी आखिरकार हाई कोर्ट ने रेलवे के फैसले को सही ठहराया और याचिका खारिज कर दी। यह फैसला दिखाता है कि सरकारी नियमों के सामने व्यक्तिगत दावे कितने सीमित हो जाते हैं।

  • 786 नंबर का बैज फिल्मों और समाज में खास महत्व रखता है, लेकिन अदालत ने साफ कहा कि यह सिर्फ एक लाइसेंस नंबर है, जिसे नियमों के तहत ही ट्रांसफर किया जा सकता है। यह पूरा मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा है, जो 2007 से एक लाइसेंस बैज को अपने नाम कराने की कोशिश कर रहा था। यह बैज मूल रूप से एक लाइसेंस प्राप्त कुली को जारी किया गया था। जब उसकी तबीयत खराब हुई, तो याचिकाकर्ता ने खुद को उसका रिश्तेदार बताते हुए बैज ट्रांसफर करने की मांग की।
  • रेलवे ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अपने रिश्ते को साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज पेश नहीं कर सका। साथ ही यह भी बताया गया कि वर्तमान नीति के अनुसार बैज का अधिकार पत्नी या बेटी को ही दिया जा सकता है।

अदालत ने क्या कहा?

गुजरात हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद साफ कहा कि रेलवे ने जो फैसला लिया, वह नियमों के अनुसार सही है। अदालत ने पाया कि याचिका में कोई ठोस आधार नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए।

नियमों में क्या है प्रावधान?

रेलवे की पुरानी नीतियों में कुछ मामलों में रिश्तेदारों को बैज ट्रांसफर करने की अनुमति थी। लेकिन नई नीतियों में यह दायरा सीमित कर दिया गया है और प्राथमिकता परिवार के सीधे सदस्यों को दी गई है।

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